बिहार में विधान परिषद की 8 सीटों पर चुनाव के नतीजे घोषित हो चुके हैं। चुनाव की पद्धति और वोटरों की संख्या के लिहाज से इस चुनाव की तुलना विधानसभा चुनाव से नहीं की जा सकती।
लेकिन इससे जनता में सबके लिए कुछ न कुछ संदेश है। हर पार्टी को कुछ न कुछ झटका लगा है।

बिहार में विधान परिषद की 8 सीटों पर चुनाव के नतीजे घोषित हो चुके हैं। चुनाव की पद्धति और वोटरों की संख्या के लिहाज से इस चुनाव की तुलना विधानसभा चुनाव से नहीं की जा सकती।
लेकिन इससे जनता में सबके लिए कुछ न कुछ संदेश है। हर पार्टी को कुछ न कुछ झटका लगा है।
शिक्षक कोटे की 4 सीटों पर चुनाव हुए और सभी 4 सीटिंग MLC चुनाव हार गये। शिक्षक देश का सबसे प्रबुद्ध समाज है। अगर वह बदलाव चाहता है तो भविष्य के चुनाव पर उनकी इस सोच का असर पड़ा सकता है। इन नतीजों से कोई भी राजनीतिक दल खुशफहमी नहीं पाल सकता। अगर खुश होने के कारण हैं तो चिंतित होने की वजहें भी हैं।
एक हाथ में खुशी तो दूसरे हाथ में गम
जदयू को नीरज कुमार की जीत से खुश नहीं होना चाहिए। जदयू के प्रदेश प्रवक्ता अभिषेक झा चुनाव हार गये। राजद ने कांग्रेस को दरकिनार 7 उम्मीदवार उतारे जिसमें से केवल संजीव सिंह जीते। माना जा रहा है कि भूमिहार ब्राह्मण होने के कारण उन्हें जीत मिली। राजद से लड़ कर कांग्रेस ने भी 5 उम्मीदवार उतारे। सभी हारे। सीटिंग MLC मदनमोहन झा भी हार गये। प्रशांत किशोर एक नयी सीट पर जीते तो दूसरी तरफ अपनी सीटिंग सीट गंवा दी। भाजपा के चर्चित नेता नवल किशोर यादव की हार बहुत चौंकाने वाली है। इस चुनाव में कोई पार्टी यह नहीं कह सकती कि उसने मैदान मार लिया।
नीरज जीते, लेकिन अभिषेक हारे
सबसे ज्यादा चर्चा पटना स्नातक सीट के चुनाव की थी। इस सीट पर जदयू के नीरज कुमार जीत गये। अनंत सिंह ने जिस अनुज कुमार का चुनाव प्रचार किया था, वे न केवल हार गये बल्कि तीसरे स्थान पर फिसल गये। इससे अनंत सिंह की साख कमजोर हुई। नीरज कुमार की जीत केवल उनके लिए राहत भरी खबर हो सकती है, जदयू के लिए नहीं। नीरज कुमार अगर जदयू के मुख्य प्रवक्ता हैं तो अभिषेक झा जदयू के प्रदेश प्रवक्ता हैं। वे भी नीरज कुमार की तरह टेलीविजन पर जदयू का चेहरा हैं। अभिषेक झा की हार जदयू के लिए चिंता की बात है।
अगर नीतीश कुमार के नाम पर नीरज जीते तो अभिषेक कैसे हारे?
अभिषेक झा ने भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के चेहरे पर ही वोट मांगा था। उनके लिए जदयू के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा समेत अन्य नेताओं ने चुनाव प्रचार किया था। भाजपा, लोजपा (आर), रालोमो के नेताओं ने उनके लिए वोट मांगे थे। इसके बाद भी वे जीत नहीं सके। अगर नीतीश कुमार के नाम पर नीरज कुमार जीते तो उन्ही के नाम पर अभिषेक झा हार गये। यानी सिर्फ नीतीश कुमार का नाम ही जीत की गारंटी नहीं है।
नीरज जीते तो लेकिन जदयू में गुटबाजी की नींव पड़ गयी!
नीरज कुमार चौथी बार MLC चुनाव जीत तो गये लेकिन जदयू में जिस गुटबाजी का बीजारोपण हो चुका है, उसका क्या होगा? नीरज कुमार सिर्फ स्नातक पास मतदाताओं के वोट से जीते हैं। करीब 88 हजार मतदाताओं में से करीब 51 हजार ने ही वोट किये। करीब 16 हजार वोट ला कर ही नीरज कुमार जीत गये। लेकिन विधानसभा चुनाव में कोई 16 हजार वोट लाकर हार ही सकता है, जीतने से तो रहा। किसी एक विधानसभा क्षेत्र में करीब 3 लाख से अधिक वोटर होते हैं। इनमें अधितम संख्या कम पढ़े-लिखे वोटरों की होती है। इनके मतदान आचराण को कई तरीकों से प्रभावित किया जा सकता है। इसलिए विधानसभा चुनाव में यह गुटबाजी भारी पड़ सकती है।
अब राजद-कांग्रेस लड़े तो समझिए गए!
राजद और कांग्रेस की आपसी लड़ाई अगर इसी तरह जारी रही तो अगले चुनाव में दोनों की और भी बुरी स्थिति हो सकती है। अगर राजद और कांग्रेस मिलकर लड़ते तो नतीजे और बेहतर हो सकते थे। राजद ने दरभंगा शिक्षक सीट पर चुनाव लड़ कर कांग्रेस के सीटिंग MLC मदन मोहन झा को हरा दिया। राजद पटना शिक्षक सीट जीती जरूर, लेकिन इसमें पार्टी से अधिक प्रत्याशी की अपनी भूमिका अधिक थी। राजद और कांग्रेस आपस में लड़कर एक तरह से एनडीए को फायदा पहुंचा रहे हैं। 2025 के बाद 2026 में जनता ने यही सीख दी।
प्रशांत किशोर के लिए ‘चेक एंड बैलेंस’
जनसुराज ने MLC चुनाव में एक सीट जीत कर बिहार विधानमंडल में अपनी राजनीतिक शक्ति बढ़ा ली है। अब उसके एक विधायक और एक MLC हो गये। लेकिन प्रशांत किशोर, प्रचार के बाद भी अपने सीटिंग MLC अफाक अहमद को जीत नहीं दिला सके। यानी बांकीपुर की जीत का करिश्मा सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में काम न आया। प्रशांत किशोर जमीन पर रहें, इसलिए जनता ने उनके लिए ‘चेक एंड बैलेंस’ लागू कर दिया। जनता ने संदेश दिया, कम बोलिए और काम कीजिए। #BiharElection #MLCResults #PoliticalAnalysis #JDUBJP #RJD #Congress #JanSuraj



