जद (यू) विधान पार्षद सह मुख्य प्रदेश प्रवक्ता श्री नीरज कुमार की घोषणा के फलस्वरुप पटना हाईकोर्ट के अधिवक्ता श्री आनंद कुमार तिवारी ने नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च के डायरेक्टर जनरल/गवर्निंग
पटना 21 अगस्त 2026
जद (यू) विधान पार्षद सह मुख्य प्रदेश प्रवक्ता श्री नीरज कुमार की घोषणा के फलस्वरुप पटना हाईकोर्ट के अधिवक्ता श्री आनंद कुमार तिवारी ने नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च के डायरेक्टर जनरल/गवर्निंग बॉडी और बिहार के विकास एवं शराबबंदी नीति को लेकर लिखे गए एक प्रारंभिक शोध-पत्र के चार लेखकों को कानूनी नोटिस भेजा है। अधिवक्ता आनंद कुमार तिवारी द्वारा भेजी गई नोटिस में एनसीएईआर के डायरेक्टर जनरल/गवर्निंग बॉडी और संबंधित चारों लेखकों से नोटिस मिलने के 7 दिनों के भीतर तथ्यात्मक, स्पष्ट और संतोषजनक जवाब देने की मांग की गई है।
यह नोटिस “Macro Perspective of Bihar’s Development: Achievements, Unfinished Agenda, and the Way Forward” शीर्षक से तैयार एक प्रारंभिक पेपर को लेकर भेजा गया है, जिसे इंडिया पॉलिसी फोरम 2026 के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है। राष्ट्रीय मीडिया के विभिन्न मंचों पर इसे व्यापक रूप से एनसीएईआर की स्टडी या रिपोर्ट के तौर पर पेश किया गया है।
पटना हाईकोर्ट के अधिवक्ता श्री आनंद कुमार तिवारी की तरफ से भेजे गए नोटिस में ये कहा गया है कि जब इंडिया पॉलिसी फोरम की अपनी प्रक्रिया के अनुसार किसी पेपर को अंतिम रूप देने से पहले उस पर चर्चा होती है, विशेषज्ञों की टिप्पणियां आती हैं और संपादकीय स्तर पर उसमें जरूरी संशोधन किए जाते हैं, तो फिर प्रारंभिक स्तर के इस पेपर को राष्ट्रीय मीडिया में व्यापक रूप से प्रसारित करने से पहले उसके तथ्यों और निष्कर्षों की जांच किस स्तर पर की गई ?
एनसीएईआर जैसे प्रतिष्ठित संस्थान की वेबसाइट पर जब कोई शोध-पत्र सार्वजनिक रूप से उपलब्ध कराया जाता है और उसके निष्कर्षों को राष्ट्रीय स्तर पर संस्थान की स्टडी या रिपोर्ट के रूप में प्रचारित किया जाता है, तो संस्थान की भी जिम्मेदारी बनती है कि वह यह स्पष्ट करे कि उसमें दिए गए तथ्य, आंकड़े और निष्कर्ष किस आधार पर हैं ?
इस पेपर को लिखने वाले डॉ. रत्ना सहाय, प्रो. संतोष गौतम, प्रो. निशीथ प्रकाश और डॉ. आकाश देव को भी हाईकोर्ट अधिवक्ता श्री आनंद कुमार तिवारी की तरफ से कानूनी नोटिस भेजा गया है। यह मामला किसी की अकादमिक स्वतंत्रता पर सवाल उठाने या किसी अलग राय से असहमति का नहीं है। अकादमिक राय अलग हो सकती है और उस पर बहस भी हो सकती है, लेकिन जब किसी बात को तथ्य और शोध के निष्कर्ष के रूप में सार्वजनिक किया जाता है, तो उसके पीछे के आंकड़े और सबूत भी स्पष्ट होने चाहिए।
नोटिस के माध्यम से लेखकों से कई महत्वपूर्ण सवालों पर जवाब मांगा गया है। खास तौर पर बिहार की शराबबंदी नीति को लेकर “राज्य के राजस्व का 14 प्रतिशत” संबंधी दावे का वास्तविक अर्थ क्या है, इसकी गणना किस आधार पर की गई है और इसे किस संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है, इस पर स्पष्टता मांगी गई है। इसी तरह, दर्ज अपराध के आंकड़ों के आधार पर हिंसा को लेकर जो निष्कर्ष निकाले गए हैं, उनके पीछे क्या सांख्यिकीय और तथ्यात्मक आधार है, इसका भी जवाब मांगा गया है।
शोध-पत्र में शराबबंदी के कारण कथित तौर पर अवैध शराब या अन्य मादक पदार्थों की ओर लोगों के जाने से जुड़े निष्कर्षों पर भी सवाल उठाए गए हैं। लेखकों से पूछा गया है कि इस तरह के निष्कर्ष के समर्थन में बिहार से जुड़े ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य क्या हैं ? इसके अलावा, अगर शराबबंदी नीति को बदलने या वापस लेने जैसी सिफारिश की गई है, तो उसके समर्थन में बिहार के संदर्भ में कोई सामाजिक लागत और लाभ का विस्तृत अध्ययन किया गया है या नहीं, इस पर भी स्पष्ट जवाब मांगा गया है।
बिहार में शराबबंदी केवल राजस्व का सवाल नहीं है, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक नीति है। इसलिए इस पर होने वाली बहस पूरी तरह सही तथ्यों, सही आंकड़ों और ठोस साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए। किसी प्रारंभिक अकादमिक पेपर को इस तरह पेश नहीं किया जाना चाहिए कि आम जनता उसे अंतिम और पूरी तरह प्रमाणित निष्कर्ष के रूप में समझने लगे।
हाईकोर्ट अधिवक्ता श्री आनंद कुमार तिवारी की तरफ से भेजी गई नोटिस में यह कहा गया है कि यदि इस निर्धारित समय-सीमा के भीतर तथ्यात्मक और संतोषजनक जवाब नहीं मिलता है, तो आवश्यक प्राधिकरण और कानूनी सलाह के बाद विस्तृत आधिकारिक प्रतिवाद जारी किया जाएगा। साथ ही, जरूरत पड़ने पर संबंधित प्रकाशकों और मीडिया या अन्य प्लेटफॉर्मों से तथ्यों में सुधार या आवश्यक स्पष्टीकरण की मांग की जाएगी तथा कानून के तहत उपलब्ध अन्य वैधानिक उपायों पर भी विचार किया जाएगा।⁵
Savinay kयह नोटिस किसी अकादमिक बहस को रोकने के लिए नहीं है और न ही केवल अलग राय रखने पर किसी को निशाना बनाया गया है। हमारा सीधा सवाल उन तथ्यों, आंकड़ों, उनके स्रोतों और निष्कर्षों के आधार को लेकर है, जिन्हें सार्वजनिक रूप से व्यापक स्तर पर प्रसारित किया गया है।
(संजय कुमार सिन्हा)
कार्यालय सचिव



